भावनाओं का असर दो-तीन महीने ही रहता है जबकि आर्थिक कारकों का सालों-साल
प्रायः लोग भावनाओं का असर दो-तीन महीने ही अनुभव करते हैं. इसके विपरीत जबकि आर्थिक कारकों का सालों-साल सालों-साल रहता हैं. भूलना मानव स्वभाव का एक महत्वपूर्ण अवयव है. हमारे मस्तिष्क की स्मृति सीमित होती है. हम नयी बातों को याद करते हैं और हमारे स्मृति-पटल से पुरानी बातें मिटती जाती हैं. एक पुरानी कहावत भी "बीती ताहि बिसारिये आगे की सुधि लेय". बड़े-बुजुर्ग लोग यह भी कहते रहे हैं कि यदि हम पुरानी बातों को ही रटते रहेंगे तो हम आगे नहीं बढ़ पायेंगे। बहुत सी पुरानी सभ्यताओं में भी किसी की हत्या का बदला लेने का अधिकार सिर्फ उसके नाती-पोतों तक ही सीमित रखा गया था और उसके बाद के पीढ़ी द्वारा बदले में की गयी हत्या को अपराध माना गया था. उक्त कहावत और मान्यता पीढ़ियों के अनुभव और साधू-सन्तों आत्म-मन्थन और आपसी विचार-विमर्श के बाद ही बनी होंगी। आधुनिक इतिहास की बहुत सी घटनायें भी उक्त तथ्य की पुष्टि करते हैं. इस सम्बन्ध में पृथ्वीराज चौहान और ग़ोरी की माफ़ी और पुनः आक्रमण की घटनाओं को उद्धृत करना उचित लगता है. पृथ्वीराज अपनी भावनाओं में बहकर ग़ोरी को हमेशा क्षमा...