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किरासन तेल, सौर ऊर्जा उत्पादों और मध्याह्न भोजन का पैसा सीधे लाभुक को दिया जाता तो उन्हें ज्यादा लाभ होता!

    पुराने ज़माने में लोग रौशनी के लिए करंज, रेंड़ी, महुआ, अलसी आदि तेलों का उपयोग अपने घरों में ढिबरी या दीपक जलाने में करते थे. यूरोप वाले इसके लिये अपने लैम्पों में जानवरों विशेषकर ह्वेल की चर्बी का उपयोग करते थे. कहा तो यह भी जाता है कि यदि किरासन तेल का अविष्कार समय पर नहीं होता तो इंसान अपनी सुविधा हेतु आख़िरी ह्वेल को भी मार देता।            अक्सर पेट्रोल/डीजल में किरासन तेल मिलाकर बेंचने  का समाचार कई सालों से मिलता रहा है. एक बार इंडियन आयल का एक बहादुर और कर्तव्य परायण अधिकारी मंजु नाथ ने एक पेट्रोल पम्प पर मिलावट की जाँच करने की धृष्टता की थी. ताकतवर मिलावटखोरों ने तो मंजु नाथ की जान ही ले ली थी.     पेट्रोल/डीजल में किरासन तेल मिलावट से गाड़ियों के इंजन पर ज्यादा भार पड़ता है और इसके चलते गाड़ियाँ ज्यादा ख़राब हो रहीं हैं. परिणामस्वरूप वाहन मालिकों को अपना बहुमूल्य समय वाहन मिस्त्रियों के यहाँ बिताना पड़ता है और उनके वाहनों के रख-रखाव पर ज्यादा खर्चा आ रहा है.     इसी तरह मध्याह्न भोजन खाकर बिमा...

हमारे चारागाहों को पुनः पनपने दिया जाय.

      भ्रष्टाचार का बोलबाल इतना ज्यादा हो गया है कि चाहे बच्चों की सरकारी शिक्षा हो, या सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाना हो या सरकारी कार्यालयों में कोई वाजिब से वाजिब काम करना हो बिना पैसे दिये कुछ आराम से नहीं होता। छोटा कर्मचारी से बड़े अधिकारी कष्ट में पड़े आम जनता को अपना चरागाह समझ बैठे हैं. कहीं आवेदन दीजिये पावती रशीद नहीं मिलता। शिकायती आवेदन को सम्बन्धित रजिस्टर में प्रविष्टि नहीं की जाती। ऊपर के अधिकारी सर्व सुलभ नहीं रहते और मिलते भी हैं तो इस तरह से व्यवहार करते हैं मानो आप अपना काम हो ही गया समझो, लेकिन काम नहीं होता। इससे तो यही लगता है कि सबकी मिलीभगत है और भ्रष्टाचार की कमाई में सबों को हिस्सा मिलता हो.      हमारे अधिकांश जनप्रतिनिधि काफी खर्च कर चुनाव जीतते हैं और उनका धन कम ही समय में कई गुना हो जाता है. इससे स्पष्ट है कि कहीं गड़बड़ी है. हमारे नेता हमारे सरकारी उपक्रमों/आयोग/बोर्ड/निगम या प्राधिकारों को चरागाह समझते है. इसके शीर्ष पदों पर आसीन होने के लिये तिकड़म और जोड़-तोड़ करते रहते हैं.      91वें संव...

सुशासन में बढ़ता कुपोषण

    हमारा संविधान कहता है कि हमारा राष्ट्र "Welfare State" यानि "कल्याणकारी राज्य" होगा। सरकार ने इसी अवधारणा को साकार करने के लिये गरीबों के हित में बहुत सी कल्याणकारी योजनाएं चला रखी है. लेकिन अजीब बात है कि सुशासन में कुपोषण बढ़ता ही जा रहा है. ऐसा क्यों हो रहा है? इस ब्लॉग में इसी विसंगति का कारण खोजने का प्रयास किया जा रहा है.     दूध की कमी:- बच्चों के विकास में दूध का विशेष योगदान रहता है. जैसे-जैसे भारत से मांस का निर्यात बढ़ रहा है, वैसे-वैसे दूध का दाम भी बढ़ रहा है. तीव्र गति से बढ़ रही हमारी जन-संख्या भी दूध के मूल्य पर दबाव बढ़ा रहा है. हमारे कानून में दुधारू पशुओं और कम उम्र के गाय/बैल ऊंट आदि को काटना वर्जित है. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कम उम्र के गाय/बैल ऊंट आदि के मांस का मूल्य भी अधिक मिलता है. लेकिन भ्रष्टाचार के कारण इस कानून की धज्जियाँ उड़ाई जा रही है. कुपोषण को दूर करने हेतु दूध की कमी की पूर्ति बाज़ार में उपलब्ध महंगे दूध का पाउडर नहीं कर पा रहा है.     कृषि में बढ़ता मशीनीकरण भी किसानों के पास...

राजधर्म और राज-कर्मी By KC Dubey

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Shri KC Dubey      संस्कृत वांग्मय में धर्म शब्द का बड़ा ब्यापक स्वरुप है। धर्म के विषय में लिखा है-- "धर्मो विश्वस्य जगत प्रतिष्ठा लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति धर्मेया पापं पनुदन्ति धर्मे सर्वम प्रतिष्ठातम तस्माधर्मे परमं वदन्ति (त्रै. आरण्यक प्रपाठक-10, अनुवाद-63). धर्म समस्त संसार की प्रतिष्ठा है। लोक जीवन में सभी लोग धर्म निष्ठ व्यक्ति के पास जाते हैं।धर्म से सब लोग अपने पाप को दूर करते हैं। धर्म में सब लोग प्रतिष्ठित हैं।इसलिये धर्म को सब लोग श्रेष्ठ कहते हैं। पूर्व मिमांसा अध्याय-1, पाठ-2, सूक्ति-2 में कहा गया है-- "चोदना लक्षण अर्थो धर्मः। उपदेश या पुनीत आदेश या वेदविहित विधि में प्रोत्साहित या प्रेरित करने वाले लक्षण युक्त कर्म को धर्म कहते हैं।      वैशेठिक अध्याय-1, अहिनक-1, सूक्ति-1 में "यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि सह धर्मः।" अर्थात कहा गया है जिससे निःश्रेयस सिद्धि हो वह धर्म है। मनुस्मृति अध्याय-6, श्लोक-92 में कहा गया है -- "धृतिः क्षमा दामोस्तेयम शौचमिन्द्रिय निग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकर्म धर्म लक्षण।।" धीरता, क्षमा, मन र...