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दूर देश की एक अधूरी कहानी

  एक दूर देश के आखिरी कोर्ट में एक अजीब मामला आया। उस मामले में मांग की गई थी कि जनहित में महिलाओं को चप्पल पहनने से रोका जाये। ऐसा इसलिये कि सैंडल की जगह चप्पल पहनने से लोगों को परेशानी होती है। इसी बीच मेरे एक शुभ चिंतक ने बताया की दूर देश की कोई कहानी लिखने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है। उस शुभ चिंतक ने मुझे सलाह दी कि " यदि शांति से जीना चाहते हो तो शत्रु, रोग और ऋण को सदैव कम करते रहो।" इसके साथ ही उसने एक लिंक भी दिया। उस लिंक को खोलने पर "बारूद की एक ढेर पर बैठी है यह दुनिया......"शीर्षक से एक पुराना 1954 का गाना बज रहा था। मैं कन्फ्यूज हो गया। पाठकों से विनती है कि इस अधूरी कहानी को पढ़ कर आप कन्फ्यूज न हों।  

क्षत्रियों को दिये जा रहे उपदेश पर द्रौपदी का ठहाका!

    महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह वाणों की मृत्यु-शैया पर लेटे हुए थे और उत्तरायण में अपने प्राण त्यागने की प्रतीक्षा कर रहे थे. भीम अपने भाइयों के साथ भीष्म पितामह से कुछ उपदेश ग्रहण करने। पितामह उन सबों को क्षत्रिय धर्म के बारे में बताने लगे. पितामह के अनुसार क्षत्रियों को निम्न धर्म का पालन करना चाहिये:- 1. अगर युद्ध क्षेत्र में कोई पीठ दिखाते हुए भाग रहा है या अब युद्ध लड़ने की स्थिति में नहीं है तो उस पर वार या प्रहार करना बन्द कर देना चाहिये और अगर आपके सामने वैसे व्यक्ति पर कोई वार कर रहा हो तो उसका भरपूर प्रतिकार करना चाहिये। 2. अगर कोई महिला लाचारी में अर्द्ध-नग्न या  नंगे अवस्था में दिख जाये तो उसका दर्शन नहीं करना चाहिये और उस महिला अर्ध-नग्न या नंगी अवस्था में पँहुचाने वाले का भरपूर प्रतिकार करना चाहिये। 3. किसी क्षत्रिय के लिये बालक-वध वर्जित है.     इन उपदेशों को सुनकर द्रौपदी ठहाका लगाते हुए हंस पड़ी और वहाँ से चलते बनी. द्रौपदी के इस अनअपेक्षित व्यवहार से सभी पाण्डू-पुत्र चौंक पड़े और द्रौपदी को रोक कर उसके ठहाका लगा कर पितामह के ...

एक दादा का अपनी पोती के नाम पत्र

मेरी स्नेहमयी पोती वर्णिका!                                                                                 राँची, शुभ आशीर्वाद,     मेरे गाँव में एक बाबा थे। उनका घर स्कूल जाने के रास्ते में पड़ता था। वे हम सहपाठियों में से किसी न किसी को उसके व्यवहार या आचरण में कमी पाकर उससे उसके दादा का नाम पूछ लेते। एक-दो दिन बाद ही उनकी शिकायत गलती करनेवाले सह पाठी के दादा के पास पँहुच जाती। उनका कहना था कि बच्चों में संस्कार देने की जवाबदेही उसके दादा की होती है।     वे कभी हम सहपाठियों को डांटते नहीं थे, बल्कि कभी-कभी सीजन में आम या अमरुद खिला देते थे। कुछ ही महीनों में वे बाबा हम लोगों को अच्छे लगने लगे थे। एक दिन मेरी भी गलती पकड़ी गयी। मेरी गलती यह थी कि उस दिन मैं बिना स्नान किये स्कूल जा रहा था। वे बाबा मेरे दादा का नाम पूछ बैठे। इसपर मेरे सभी सहपाठी हंस पड़े। उक्त बा...