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यदि रेल गाड़ी ऐसे चलती तो कितना अच्छा होता!

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     बहुत दिनों से मन में इच्छा जगते रहती थी कि काश! रेल गाड़ी ऐसे चलती तो कितना अच्छा होता! इच्छायें तो मन में आती हैं; फिर यह सोचकर दब जाती हैं कि मेरे सोचने से क्या होगा। कई बार तो हटिया-पटना एक्सप्रेस ट्रेन में जब सुबह में जहानाबाद से काफी बड़ी संख्या में अनपेक्षित यात्री स्लीपर क्लास में चढ़ जाते हैं. पता चलता है कि अधिकांश यात्री मज़बूरी में और कुछ तो मनशोखी में ट्रेन चढ़ जाते हैं. आरक्षित यात्रियों को अब अपना बर्थ का अधिकार छोड़ना पड़ता है. कुछ देर के बाद अनपेक्षित यात्री बर्थ पर बैठकर अपना उसपर अपना अधिकार भी ज़माने लगते हैं.      यात्री प्रायः मध्यम या अधिक दूरी के यात्रा में व्यवधान नहीं चाहते हैं. इसी कारण आरक्षित यात्री दिन में लोकल यात्रियों का प्रतिरोध नहीं करते। जब यह ट्रेन आदतन छोटे स्टेशनों पर या बाहरी सिग्नल पर रुकते चलती है तब लोकल यात्रियों में रेल परिचालन से संबंधित खूब बहस होती है. कभी-कभी तो यह बहस काफी तार्किक और ज्ञानवर्धक होती है. उन्ही बहसों में से कुछ निम्न बिन्दु उल्लेखनीय लगते हैं-- (1). 13329 धनबा...

बिना किराया बढ़ाये भी रेल की आमदनी बढ़ायी जा सकती है

   अंग्रेजों ने रेलवे का महत्व पहचाना था. उनलोगों ने पाया कि रेलगाड़ी से उतने ही ईंधन में सड़क मार्ग की अपेक्षा करीब दस गुना वजन और वह भी अधिक तेजी से ढोया जा सकता है तथा हवाई और सड़क परिवहन की तुलना में प्रति यात्री काफी कम ईंधन लगता है. रेलवे के इस महत्व को देखते हुए अंग्रेजों ने भारत भर में रेलवे का जाल फैला दिया। बाद में कोयला के बदले ट्रेनों को बिजली और डीजल इंजन से चलाया जाने लगा. 1973 में पहली बार के विश्व तेल संकट ने विश्व के तमाम देशों को रेलवे के विद्युतिकरण हेतु वाध्य कर दिया। इस दौड़ में हम पिछड़ गये. रेलवे हमारे अर्थ-तन्त्र का वाहक हुआ करता था.    धीरे-धीरे रेलवे की उपेक्षा की जाने लगी. जो रेलवे हमारे देश में भी माल और यात्री परिवहन में अग्रणी था अब इन दोनों क्षेत्रों में सड़क मार्ग से प्रति वर्ष पिछड़ता जा रहा है. परिणामतः आज हमारा देश अपनी आवश्यकता का 82% कच्चा तेल आयात कर रहा है यानि हमने अपनी अर्थ-व्यवस्था का डिजलीकरण कर लिया है. विश्व मंडी में कच्चे तेल का या डॉलर का भाव बढ़ते ही हमारे यहाँ बेचैनी फैलने लगती है. आशा है नयी सरकार रेलवे के महत्व को समझेगी। ...