एक दादा का अपनी पोती के नाम पत्र
मेरी स्नेहमयी पोती वर्णिका! राँची, शुभ आशीर्वाद, मेरे गाँव में एक बाबा थे। उनका घर स्कूल जाने के रास्ते में पड़ता था। वे हम सहपाठियों में से किसी न किसी को उसके व्यवहार या आचरण में कमी पाकर उससे उसके दादा का नाम पूछ लेते। एक-दो दिन बाद ही उनकी शिकायत गलती करनेवाले सह पाठी के दादा के पास पँहुच जाती। उनका कहना था कि बच्चों में संस्कार देने की जवाबदेही उसके दादा की होती है। वे कभी हम सहपाठियों को डांटते नहीं थे, बल्कि कभी-कभी सीजन में आम या अमरुद खिला देते थे। कुछ ही महीनों में वे बाबा हम लोगों को अच्छे लगने लगे थे। एक दिन मेरी भी गलती पकड़ी गयी। मेरी गलती यह थी कि उस दिन मैं बिना स्नान किये स्कूल जा रहा था। वे बाबा मेरे दादा का नाम पूछ बैठे। इसपर मेरे सभी सहपाठी हंस पड़े। उक्त बा...