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एक बेरोजगार की भीष्म-प्रतिज्ञा!

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     एक गाँव के एक लड़का को नौकरी मिलते-मिलते रह जाती थी। उसके पिता किसी निजी कम्पनी में उसे छोटा-मोटा काम भी नहीं करने देते थे; खानदान के इज़्ज़त का जो सवाल था। नौकरी नहीं मिलने के लिये वह लड़का अपने किस्मत को दोष देता जबकि उसके पिता आरक्षण को।      एक दिन वह लड़का एक लैपटॉप की मांग अपने पिता से कर बैठा। उसके दहेज़ लोभी पिता ने उसे समझाया कि लैपटॉप उसकी शादी में दहेज़ में मिल जायेगा। इस पर वह लड़का भड़क गया। उस लड़के ने गुस्से में आकर एक भीष्म-प्रतिज्ञा कर डाली कि जब तक हमारे नेताजी प्रधान मन्त्री नहीं बन जाते तब तक वह शादी नहीं करेगा। उसने सबको बताया कि नेताजी के प्रधान मन्त्री बन जाने से सब बेरोजगारों को एक-एक स्मार्ट फोन मिल जायेगा और सभी को नौकरी भी मिल जायेगी। इस तरह देश की सभी समस्यायों का समाधान हो जायेगा।      वह लड़का अब नेता बन गया और अपनी भीष्म-प्रतिज्ञा को पूरी करने में जुट गया। एक व्यक्ति अपनी उम्र की सीमा पार करने पर भी बेरोजगार रह गया था. उसने नये नेताजी से पूछ ही लिया।...

जंगल में मोर नाचा; किसने देखा?

     बहुत से लोग अच्छा वेतन छोड़कर कम वेतनमान में सरकारी नौकरियों में योगदान करते रहे हैं। सबके अपने-अपने तर्क हैं। एक ने बड़ा ही अजीब तर्क दिया। उसका तर्क था- "जंगल में मोर नाचा; किसने देखा?". इस तरह के अनेकों तर्क सुने जाते रहे हैं. उन्ही तर्कों के आधार पर यह ब्लॉग प्रस्तुत किया जा रहा है.      भले ही गैर प्रशासनिक पदधारियों का वेतन ज़्यादा हो, लेकिन छोटे बड़े सभी प्रशासनिक पदधारियों को उनके नौकरी कार्य-काल में ऊपरी कमाई के मौके(Scope) ज्यादा मिलते हैं.       छोटे बड़े सभी प्रशासनिक पदधारियों को सरकारी गाड़ी, बंगला, ड्राइवर, नौकर-चाकर आदि की सुविधा गैर-प्रशासनिक पदधारियों की तुलना में बहुत ज्यादा है.       प्रायः लोगों के माता-पिता को गैर-प्रशासनिक पदधारियों के माता-पिता को की तुलना में सस्ते में या कभी-कभी मुफ्त में चिकत्सीय सहायता उब्लब्ध हो जाता है. इसलिये भी माता-पिता अपने बच्चों को प्रशासनिक पदों पर भेजना पसन्द करते हैं. क्या कुछ मामलों में यह सही नहीं है कि नौकरी पा जानेवाले अपने मात...

पावर पावर की बात है!

      बहुत दिन पहले की बात है. गोरे अंग्रेज तो चले गये थे लेकिन अपने चमचों को काले अंग्रेज़ के रूप में छोड़ गये थे. कई राज्य सरकारों ने हिन्दी को अपनी राज-काज की भाषा स्वीकार कर ली थी. निचले कर्मचारी हिन्दी को राज-काज की भाषा घोषित किये जाने से बहुत खुश थे, लेकिन ख़ुशी की मात्रा अधिकारियों में कम थी.      (1) रविवार के छुट्टी के दिन दो साहब लंच पर मिले। दोनों के साथ उनकी सेवा में उनके अर्दली भी थे. पहले आज के सहायक को अर्दली कहा जाता था. आज भी बहुत से लोग सहायकों को अर्दली ही कहते हैं. उनमे से एक साहब फौजी अफसर थे और दूसरे किसी अन्य विभाग के अधिकारी थे. फौजी अफसर ने दूसरे अफसर से लंच के गपशप में बताया कि उसका अर्दली बहुत बेवकूफ है. दूसरे अफसर भी गप्पबाज़ी में पीछे नहीं थे सो उन्होंने भी अपने अर्दली को एक नम्बर का बेवकूफ बताया। दोनों साहबों में अर्दलियों की बेवकूफी साबित करने की होड़ लग गयी.      फौजी साहब ने आवाज दी-  अर्दली! बाहर खड़े अर्दली ने अपने साहब की आवाज पहचान कर भोजन कक्ष में दाखिल हुआ और सलामी की औपचारिकता निभायी। फौजी साहब...

सुने-सुनाये चुटकुले जो जीवन की कुछ सच्चाई दर्शाते हों

बहुतों ने इन चुटकलों को जरूर सुना होगा, लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होंगे जो जिनको इन्हे सुनने का मौका ही नहीं मिला। इन्ही लोगों के लिये ये चुटकुले यहाँ प्रस्तुत है:- 1. जब भगवान ने सभी प्राणियों का सृजन किया तो प्रायः बड़े प्राणियों की उम्र पच्चीस वर्ष निर्धारित कर दी तथा उनके कार्यों का निर्धारण भी कर दिया। एक युग बाद भगवानजी को लगा कि कुछ प्राणियों से पूछ लिया जाय कि वे उम्र निर्धारण से सन्तुष्ट हैं या नहीं।     सबसे पहले घोड़ा को बुलाया गया और उनका मन्तव्य इस सम्बन्ध में पूछा गया. घोड़ा ने अदब से जवाब दिया और बोला कि उसे आदमी को बैठाकर दौड़ते हुए उसे ढोना पड़ता है या सामान को खींचना पड़ता है.  इसलिये वह पच्चीस वर्ष के उम्र से सन्तुष्ट नहीं है. उसने भगवानजी से प्रार्थना की कि इनका उम्र दस वर्ष कम कर दी जाय.     इसके बाद बैल को बुलाया गया. उसने बताया कि भले ही उसे धीरे-धीरे बोझ ढोना पड़ता है और बिना मतलब के गाड़ीवान या व्यापारी पीटते रहता है. साथ ही बैल ने यह भी शिकायत की कि हलवाहा हल जोतते समय अपने भी पसीने-पसीने हो...

ट्रेनों के विलम्ब से चलने के कुछ फायदे; एक व्यंग्य!

    ट्रेनों के विलम्ब से चलने के कुछ फायदे भी होते हैं. एक बार एक व्यक्ति को ट्रेन से यात्रा करने के पहले उसके घर पर कुछ काम आ गया. वह ट्रेन की लेट-लतीफी के कई किस्से सुन रखा था. सो उसने अपना काम निपटा लेना ही उचित समझा और मन ही मन भगवान से ट्रेन लेट करने हेतु प्रार्थना भी करता रहा. जब स्टेशन पँहुचा और टिकट लेकर प्लेटफार्म पर पँहुचा तो उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. वह ट्रेन में चढ़कर एक उपयुक्त सीट पर बैठकर भगवानजी को धन्यबाद देते रहा. जब दस-बारह मिनट बाद भी ट्रेन नहीं खुली तो वह रेल विभाग को लेट-लतीफी के लिये कोसने लगा. उसके एक सह यात्री से नहीं रहा गया. उसने समझाया कि भगवानजी बड़े दयालु हैं. हो सकता है कि वे आप ही की तरह ट्रेन से यात्रा करने वाले किसी और भक्त की प्रार्थना स्वीकार कर लिये हों. इसलिये रेल विभाग कोसने के बजाय उस भक्त की प्रतीक्षा की जाय. ट्रेनों के विलम्ब से चलने के कुछ फायदे:-  1. शाम को लगभग छः बजे के आस-पास एक पैसेंजर ट्रेन सासाराम(बिहार) से आरा के लिये अपने 96 कि.मी के सफर पर खुलती है. इसे करीब साढ़े तीन घंटे का सफर पूरा कर अपने गन्...