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हमारे न्यायालयों में करोड़ों मामलों के लम्बित रहने के कुछ कारण!

    मीडिया के ख़बरों के अनुसार हमारे न्यायालयों में करीब साढ़े तीन करोड़ मामले लम्बित हैं और यह हर महीने बढ़ता ही जा रहा है. इस तरह हमारी आबादी का लगभग 10% हिस्सा न्यायालयों में वर्षों चक्कर लगाते रहता है. कुछ लोग इस संख्या को और भी ज्यादा बताते हैं. ऐसा होने के कुछ निम्न प्रकार के कारण लगते हैं:---- 1. प्रायः मामलों की शुरुआत पुलिस थानों से होती है. कुछ मामलों की शुरुआत न्यायलय से भी होती है. पीड़ितों की आम शिकायत रहती है कि पीड़ितों का पुलिस थानों में उतना स्वागत नहीं होता, जितना कि वे उम्मीद करते हैं. आस-पास के कुछ दलाल लोग पीड़ित को घेर लेते हैं और उसका दोहन कर नमक-मिर्च, मसाला लगाकर प्रथम सूचना पत्र दर्ज करवा देते हैं. गवाहों को मालूम भी नहीं रहता है कि क्या जोड़ा या क्या घटाया गया है. इससे न्यायालयों को सच्चाई निकालने में काफी कठिनाई होती है और मामले अनावश्यक रूप से लम्बा चलते रचोरी, लूट हते है. पीड़ित को सबसे ज्यादा परेशानी  चोरी(घर से या बाहर से) , लूट और भूमि विवाद में हुए मारपीट के मामलों को दर्ज कराने में होती है. इसमें वि...

दण्ड विधानों में सतत सुधार की आवश्यकता।

                     दण्ड विधानों में सतत सुधार की आवश्यकता।      1857 के बगावत के बाद अंग्रेजों ने भारतीय दण्ड विधान को 6 अक्टूबर 1860 में पास कर पहली जनवरी 1862 को पूरे भारत में लागू किया। अंग्रेजों ने अपने पहले विधि आयोग की स्थापना लॉर्ड मैकॉले की अध्यक्षता में की थी। इस आयोग ने अपना प्रतिवेदन तत्कालीन गवर्नर-जेनरल के Council में 1837 में प्रस्तुत किया। गहन मन्थन के बाद इसे 1860 में उक्त Council ने पास किया।      इस कानून के लागू होने के पहले अपने देश की लगभग नब्बे प्रतिशत आबादी गावों में बस्ती थी, जहाँ ग्राम-सभा एक मजबूत संस्था हुआ करती थी. गावों के लोग एक जगह पर बैठ कर अपनी समस्याओं पर विचार-विमर्श कर उनका समाधान निकाल लेते थे. छोटे-मोटे अपराधों का निपटारा भी वहीँ हो जाता था. भारतीय दण्ड विधान लागू होने से यह ग्रामीण संस्था कमजोर पड़ते चला गया.        इसके पहले अंग्रेजी सरकार अपने कुछ आदेशों के द्वारा शासन करती थी। आदेशों के अनुपा...