Posts

जंगल में मोर नाचा; किसने देखा?

     बहुत से लोग अच्छा वेतन छोड़कर कम वेतनमान में सरकारी नौकरियों में योगदान करते रहे हैं। सबके अपने-अपने तर्क हैं। एक ने बड़ा ही अजीब तर्क दिया। उसका तर्क था- "जंगल में मोर नाचा; किसने देखा?". इस तरह के अनेकों तर्क सुने जाते रहे हैं. उन्ही तर्कों के आधार पर यह ब्लॉग प्रस्तुत किया जा रहा है.      भले ही गैर प्रशासनिक पदधारियों का वेतन ज़्यादा हो, लेकिन छोटे बड़े सभी प्रशासनिक पदधारियों को उनके नौकरी कार्य-काल में ऊपरी कमाई के मौके(Scope) ज्यादा मिलते हैं.       छोटे बड़े सभी प्रशासनिक पदधारियों को सरकारी गाड़ी, बंगला, ड्राइवर, नौकर-चाकर आदि की सुविधा गैर-प्रशासनिक पदधारियों की तुलना में बहुत ज्यादा है.       प्रायः लोगों के माता-पिता को गैर-प्रशासनिक पदधारियों के माता-पिता को की तुलना में सस्ते में या कभी-कभी मुफ्त में चिकत्सीय सहायता उब्लब्ध हो जाता है. इसलिये भी माता-पिता अपने बच्चों को प्रशासनिक पदों पर भेजना पसन्द करते हैं. क्या कुछ मामलों में यह सही नहीं है कि नौकरी पा जानेवाले अपने मात...

"Late, thin and a few" की नीति को अपना कर भी जन-संख्या नियंत्रित की जा सकती है।

     अपने देश में जितने संसाधन पैदा किये जा रहे हैं उससे अधिक गति से हमारी जन-संख्या बढ़ रही है। हमारी जन-संख्या बांग्लादेश और म्यनमार के शरणार्थी भी बढ़ा रहे हैं. औद्योगीकरण का प्रभाव भी हमारी जन-संख्या पर पड़ रहा है। आज हर जगह स्वचालन(Automation) का प्रचलन बढ़ रहा है। दुनिया में रोबोट की संख्या हमारी जन-संख्या वृद्धि से लगभग दस गुना की तेजी से बढ़ रही है। ये दोनों मिलकर जहाँ दस रोजगार पैदा कर रहे हैं वहीँ दूसरी और बारह रोजगार समाप्त कर रहे हैं। यह सुनने में  भले ही अटपटा और काल्पनिक लगे लेकिन इतना तो कटु सत्य है कि स्वचालन और रोबोट से जितने रोजगार पैदा हो रहे हैं उससे ज्यादा रोजगार छीने जा रहे हैं। परम्परागत रोजगार में अवसर कम हो रहे हैं:-  पहले रेलवे में सभी टिकट हाथ से ही काटे जाते थे. आज हालत ऐसी हो गयी है कि 65% से ऊपर बर्थ और चेयर कार में टिकट ऑनलाइन कटाये जा रहे हैं. UTS प्रणाली से सामान्य टिकट भी कटने लगे हैं और इन सेवाओं का तीव्र गति से विस्तार हो रहा है. यह एक छोटा सा उदहारण है. पाठकगण यदि थोड़ा इस पर चिन्तन करेंगे तो उन्हों...

अधिक दिनों तक कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर से कम रहना हमारी अर्थ-व्यवाथा के अच्छा नहीं है।

     हम बहुत वर्षों से यह सुनते और देखते आ रहे हैं कि जब-जब पेट्रोलियम पदार्थों का मूल्य बढ़ता है तब-तब प्रायः सभी वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य बढ़ जाते हैं। अब हमें इसके उलटे असर के लिये भी तैयार रहना चाहिये। Shale Oil उत्पादन के खर्चे में कमी आने सौर ऊर्जा के दाम घटने से भी कच्चे तेल सहित ऊर्जा के स्रोतों से प्राप्त होने वाले माध्यम जैसे कोयला, पवन टरबाइन आदि के मूल्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घट रहे हैं. इनसे दुनिया भर में उत्खनन(Mining) और परिवहन सस्ता हो रहे हैं। ऐसे में लोहा, कृषि उपज सहित बहुत से उत्पादों का सस्ता होना लाजिमी है। इन सामानों का उपभोग बढ़ने के परिणाम स्वरुप हमारा आयात बढ़ जायेगा। यदि इसी अनुपात में हमारा निर्यात नहीं बढ़ा तो हमारे रुपया की कीमत घटते जायेगी। वर्ष 2008 के दिसम्बर माह में अमेरिका की मंदी से घबराहट में अल्प काल के लिये WTI कच्चे तेल की कीमत $47 प्रति बैरल तक आ गयी थी. लेकिन इस बार कच्चे तेल की कीमत धीरे-धीरे गिर रही है. ऐसा लगता है कि इस बार की गिरावट दीर्घकालिक होगी। आपूर्ति पक्ष(Supply side):-  सकारा...

बिहार के पिछड़ेपन के कुछ छिपे कारण!

     आज़ादी के बाद जहाँ बिहार विकसित राज्यों में अग्रणी था वहीँ आज पिछले पायदान पर पँहुच गया. कहा जाता है कि विकास की ईमारत पूँजी निवेश, सस्ती ऊर्जा, Smart Banking System, दक्ष परिवहन प्रणाली और अच्छी विधि-व्यवस्था नामक पाँच पायों पर खड़ी होती है. सभी लोग बिहार को बीमारू राज्य की संज्ञा देते हैं. कुछ तो बिहार के पिछड़ने के कारण रहे होंगे. मेरी समझ से बिहार निम्न कारणों के से समय के साथ-साथ नहीं चल पाया और विकास की दौड़ में पिछड़ गया.      बिहार मूलतः कृषि प्रधान प्रदेश है. यहाँ की भूमि उपजाऊ है और नदियां भी प्रचुर मात्रा में हैं. ये नदियां नेपाल, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड से अपने साथ उपजाऊ मिटटी भी लाती हैं. अंग्रेजों ने सिंचाई सुविधा बढ़ाने हेतु "सोन नहर योजना" पूरी की थी. समय के साथ यह योजना ने अपनी सार्थकता खो दी. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने सोन, गण्डक, बागमती, कोशी, उत्तरी कोयल, दुर्गावती आदि कई सिंचाई योजनाओं प्रारम्भ की. इनमे से दुर्गावती और उत्तरी कोयल नदी पर बनने वाली मण्डल सिंचाई योजना को तो लगभग लकवा मार दिया है. ...

पावर पावर की बात है!

      बहुत दिन पहले की बात है. गोरे अंग्रेज तो चले गये थे लेकिन अपने चमचों को काले अंग्रेज़ के रूप में छोड़ गये थे. कई राज्य सरकारों ने हिन्दी को अपनी राज-काज की भाषा स्वीकार कर ली थी. निचले कर्मचारी हिन्दी को राज-काज की भाषा घोषित किये जाने से बहुत खुश थे, लेकिन ख़ुशी की मात्रा अधिकारियों में कम थी.      (1) रविवार के छुट्टी के दिन दो साहब लंच पर मिले। दोनों के साथ उनकी सेवा में उनके अर्दली भी थे. पहले आज के सहायक को अर्दली कहा जाता था. आज भी बहुत से लोग सहायकों को अर्दली ही कहते हैं. उनमे से एक साहब फौजी अफसर थे और दूसरे किसी अन्य विभाग के अधिकारी थे. फौजी अफसर ने दूसरे अफसर से लंच के गपशप में बताया कि उसका अर्दली बहुत बेवकूफ है. दूसरे अफसर भी गप्पबाज़ी में पीछे नहीं थे सो उन्होंने भी अपने अर्दली को एक नम्बर का बेवकूफ बताया। दोनों साहबों में अर्दलियों की बेवकूफी साबित करने की होड़ लग गयी.      फौजी साहब ने आवाज दी-  अर्दली! बाहर खड़े अर्दली ने अपने साहब की आवाज पहचान कर भोजन कक्ष में दाखिल हुआ और सलामी की औपचारिकता निभायी। फौजी साहब...

हमारी अर्थ-व्यवस्था पर सोना का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव

     एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में लगभग बीस हज़ार टन सोना है. इनमे से अधिकतर सोना लोगों के पास गहनों एवं सोने के बिस्कुट  के रूप में जमा है. हमारे मन्दिरों में भी चढ़ावे के रूप में मिला बहुत सोना है. कई मन्दिरों में तो देवी-देवताओं की मूर्तियां भी सोने की बनी हुई है. पूर्व ज़माने में राजा अपने राज-मुकुट और राज-सिंहासन भी सोना के ही बनवाते थे. महिलाये सोने के प्रति ज्यादा आसक्त होती हैं. सोने के गहनों के बिना महिलाओं का श्रृंगार भी अधूरा रहता है. यानि हमारे यहाँ सोना समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.      दुनिया में सबसे ज्यादा विकास सोने की खोज और दीर्घायु बनाने हेतु औषधि की खोज में ही हुई है. इन दोनों प्रयासों में विज्ञानं का बहुत विकास हुआ है. प्राचीन काल में अपने देश में नागार्जुन ने सोने की खोज में अपना जीवन लगा दिया। बाद में पता चला कि सोना तो एक रासायनिक तत्व Au है. यह एक गैर रेडियो धर्मी तत्व है यानि न तो इसे बनाया जा सकता है और न इसे नष्ट किया जा सकता है. सोना प्राकृतिक रूप से कुछ नदियों की रेत और खदानों में मिलता है, जिसे साफ क...

भूमि अधिग्रहण समस्या के कुछ साधारण समाधान!

Image
     इधर कुछ महीने से भूमि अधिग्रहण पर काफी गरमा-गरम बहस छिड़ी हुई है. जो नेता पहले भूमि-अधिग्रहण का विरोध करते थे अब समर्थन करने लगे हैं और जो समर्थन करते थे अब विरोध करने लगे. अंग्रेजों ने 1894 में पहला भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था और उसी के अनुसार दो वर्ष पहले तक भूमि अधिग्रहण होता रहा. भूमि अधिग्रहणों से बड़ी संख्या में किसान विस्थापित हुए हैं. उनके पुनर्वास हेतु कई योजनायें भी चलायी गयी हैं लेकिन उन योजनाओं से विस्थापितों का कितना कल्याण हुआ वह विस्थापित ही बता सकते हैं.      पुनः दूसरा भूमि अधिग्रहण वर्ष 2013 में UPA सरकार ने पास किया। यह कानून इतना पेंचीदा और अव्यवहारिक है कि इसके अन्तर्गत किसी भूमि का अधिग्रहण नहीं हो सका.  यह विडम्बना ही है कि ऐसे बहुत नेता हैं जिन्होने पूर्व में इस कानून का समर्थन किया था वे अब उसे अव्यवहारिक मानकर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाये है, जिसका अभी विरोध हो रहा है. ऐसा दुनिया में शायद ही कहीं हुआ हो की विस्थापितों के पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की गयी हो.      प्रायः निम्न तीन बि...