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बच्चों की Security और सेफ्टी पर कुछ चिन्ता

    आये दिन स्कूलों में बच्चों की Safety और Security से उत्पन्न खतरों के समाचार टीवी, सोशल मीडिया और अख़बारों पर आ रहे हैं. हाल ही में हुए रेयान स्कूल, गुरुग्राम में एक सात वर्षीय बालक प्रदुम्न की निर्मम हत्या की घटना ने तो पूरे देश को झकझोर कर ही रख दिया है। उसके एक दिन बाद दिल्ली के एक स्कूल से एक पॉँच वर्षीय बालिका के साथ हुए पाश्विक बलात्कार की घटना ने तो अभिभावकों के जले पर नमक छिड़क दिया. स्कूल बसों एवम अन्य स्कूल वाहनों से बच्चों के मरने या उनके जख्मी होने के समाचार तो आम हो चले हैं. अब समय आ गया है कि बच्चों के Security और उनके Safety पर वाजिब चिन्ता जाहिर करते हुए इनपर आवाज उठायी जाये।     रेयान स्कूल, गुरुग्राम की घटना इसलिये भी अत्यन्त चिन्ताजनक है क्योंकि वह स्कूल अपने देश के लगभग 140 स्कूलों वाले एक बहुत ही नामी स्कूल में घटी है. नामी स्कूल प्रबन्धन से उम्मीद की जाती है कि वे अपने नाम के अनुरूप ही अपने स्कूलों में बच्चों की Security और Safety हेतू उचित प्रबन्ध किये होंगे। आज ही यानि 14.09.2017 को एक और दुःखद समाचार आया कि मलेशिया की र...

Thanks और Sorry का प्रभाव भी मतदान पर पड़ता है

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   अंग्रेजों ने हमें अपनी भावना को व्यक्त करने हेतु Thanks और Sorry के रूप में दो शक्तिशाली शब्द दिये हैं. बड़े और शरीफ लोग इन दोनों शब्दों का उपयोग बड़े पैमाने पर करते हैं. अब तो इन दोनों शब्दों का उपयोग मतदान के समय भी किया जाने लगा है. सभी अच्छे कार्यों की चर्चा खूब की जाती है और इससे सरकारी नेताओं की खूब बड़ाई होती है. किसी अच्छे कार्य का श्रेय लेने की होड़ सी लग जाती है. बड़े नेताओ के चाटुकार लोग तो इस अवसर का खूब लाभ उठाते हैं. इसके विपरीत कार्य करने वाले कनीय नेता और अधिकारी चुप रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं. श्रेय लेने वालों और दिलाने वालों को खूब Thanks मिलता है. उसी तरह अपने किये गये वादों को पूरा नहीं किये जाने पर Sorry बोला जाता है और उन्हें पूरा करने हेतु और अधिक समय की मांग की जाती है. यही सिलसिला चुनाव दर चुनाव चलते रहता है.     जब अटलजी ने परमाणु परीक्षण कराये थे तो बड़े लोगों ने उनकी खूब प्रशंसा की थी. जब उन्होंने अच्छी सड़कें बनवाई तब गाड़ी-मालिक और उनके उपयोग करने वालों ने उनकी खूब तारीफ की थी. अच्छी सड़कों के पास की जमीन की उपय...

भारत और म्यांमार के बीच मजबूत सम्बन्ध समय की माँग है

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    म्यांमार(पूर्व का बर्मा) हमारा पूर्वी पडोसी देश है. पहली अप्रैल 1937 को ब्रिटिश इंडिया से बर्मा को अंग्रेजों ने अलग कर उसपर अलग से शासन शुरू किया। बर्मा ने 1948 में अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त की अभी म्यांमार में शान्ति के लिये नोबेल पुरष्कार प्राप्त श्रीमती औंग सान सू की का शासन चल रहा है. भारत और म्यांमार में काफी समानतायें हैं. इन दोनों देशों के बीच का मजबूत सम्बन्ध समय की मांग है. इन दोनों देशों में अभी शासन की प्रजातान्त्रिक व्यवस्था चल रही है. इन दोनों देशों के बीच का सम्बन्ध दो हजार वर्ष से भी पुराना है. सम्राट अशोक के ज़माने से भारत से लोग बर्मा जाने लगे थे. अभी म्यंमार बौद्ध प्रधान देश है जिसकी जड़ें भारत में जमी हुई हैं.      मुग़ल वंश का अन्तिम बादशाह बहादुर शाह द्वितीय ने अपनी अन्तिम सांस बर्मा में ली थी. उनका कब्र वहाँ के रंगून शहर के पास ही स्थित है. द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना में शामिल बहुत से भारतीय सैनिकों ने जापानी सैनिकों के समक्ष समर्पण कर आज़ाद हिन्द सेना में शामिल हो गये थे. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिन्द सेना ...

मजबूत भारत के निर्माण में मुफ्तखोरी एक बड़ी बाधा है

    हम सभी भारतवासी चाहते हैं कि हमारा भारत एक मजबूत राष्ट्र बने. मजबूत भारत ही हमारी शान है; हमारी पहचान है. मजबूत भारत के निर्माण में बहुत सी बाधायें हैं. मुफ्तखोरी भी उन्ही बड़ी बाधाओं में से एक है. पहले मुफ्तखोरी की समस्या कोई बड़ी समस्या नहीं थी. जैसे किसी संयुक्त परिवार में किसी कमजोर सदस्य का गुजारा बड़ी आसानी से हो जाता था वैसे ही मुफ्तखोरों का भी गुजारा हो जाता था. लेकिन इधर व्यापक उत्कोच और अन्य कारणों से मुफ्तखोरी बड़ी तेजी से पनप रही है. अब बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि मुफ्तखोरी से प्रभावित लोगों की श्रम-उत्पादकता घट रही है. श्रम-उत्पादकता का घटना कामचोरी को बढ़ा रहा है. यह समस्या एक चिन्ता उत्पन्न करने वाली है.       दुनिया भर में लोग अच्छी वस्तुओं और अच्छी सेवाओं का उपभोग सभी लोग करना चाहते हैं. अधिकांश लोगों को यह सुविधा अपने माँ-पिता से और फिर अपने श्रम और बुद्धि से उनके आर्थिक ताकत के हिसाब से मिलते रहती है. ऐसे लोगों के जीवन में आर्थिक उतार-चढ़ाव व्यवस्थित ढंग आते-जाते रहता है. जब कभी ऐसे लोगों को आर्थिक झटके लगते हैं तो उन ल...

डेरा और मठ का बढ़ता-घटता प्रभाव

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    युग/समय के साथ डेरा और मठ का प्रभाव हमारे देश में बढ़ता-घटता रहा है. भक्ति युग में कुछ भक्त सांसारिक सुखों को त्याग कर साधू बनने लगे. अनपढ़ साधू भी तीर्थाटन के क्रम में अन्य ज्ञानी साधुओं की सुसंगति में शास्त्रार्थ में समय बिताने लगे और अपना ज्ञानवर्धन करते-करते स्वयं भी ज्ञानी हो गये. साधु लोग अपना अधिकांश समय तीर्थाटन और धार्मिक प्रवचनों में व्यतीत करते थे. बड़े साधू को कालान्तर में सन्त की उपाधि दी गयी. कई बड़े साधुओं ने घूमते-घूमते थक हारकर अपने जीवन को स्थिर करने और अपना प्रभाव बढ़ाने हेतु मठों की स्थापना की. उम्र बढ़ने के बाद साधुलोग बाबा कहलाने लगे. पुराने साधूलोगों ने अपना सारा जीवन सादगी के साथ दूसरों और समाज के कल्याण में बिता दिया।     ईसाई धर्म में Charity, इस्लाम धर्म में जकात और सनातन(हिन्दू) धर्म में "सीधा" और "अगउँ" जैसे दान देने की प्रथा की प्रधानता पहले से ही रही है. प्रायः सभी धर्म-परायण व्यक्ति अपनी कमाई का एक छोटा सा अंश दान के रूप में देते रहे हैं. इस तरह दान से प्राप्त राशि से बहुत से अस्पताल और विद्यालय भी चलते हैं. दान से गरीबो...

सृजन घोटाला संस्थागत विफलताओं का भी परिणाम है

    आजकल बिहार के "सृजन घोटाला" की बड़ी चर्चा हो रही है. इस घोटाले के केन्द्र में सृजन नाम का एक गैर सरकारी(NGO) संगठन भागलपुर, बिहार में है. कुछ महीने पूर्व इस NGO की संचालिका मनोरमा देवी की मृत्यु हो गयी. उसके उत्तराधिकारी मनोरमा देवी की विरासत को सम्हाल नहीं पाये, जिसके कारण भागलपुर के एक अधिकारी का लगभग दो करोड़ रुपये के चेक bounce हो गया यानि उस सरकारी चेक को यह कहकर बैंकवालों ने लौटा दिया कि उस अधिकारी के खाते में उतनी राशि उक्त तिथि को नहीं थी जबकि सरकारी बही-खातों में उसके बैंक खाते में उससे ज्यादा राशि होनी चाहिये थी. यह एक असामान्य घटना साबित हुई और हंगामा मच गया. यह घोटाला बिहार के बाहर भी अख़बारों, टीवी और सोशल मीडिया में अभी भी छाया हुआ है और भविष्य में भी काफी दिनों तक छाया रहेगा।     अब सवाल उठता है कि इसका नाम "सृजन घोटाला" क्यों पड़ा?  कुछ लोग तो इसे "पापड़ घोटाला" भी कहते हैं क्योंकि सृजन नाम के NGO की संचालिका स्व. मनोरमा देवी को अपने उस NGO को ज़माने में काफी पापड़ बेलने पड़े थे. पहले की व्यवस्था के अनुसार वित्तीय वर्ष के अन्त तक यानि इक्...

आपदा प्रबन्धन और सुशासन

    अभी अपने देश के कई भागों में बाढ़ की विभीषिका लोगों के जीवन को नरकमय बना दिया है. बाढ़ तो हमारे देश की हर साल आनेवाली एक स्थायी आपदा बनती जा रही है. अब लोग इस विषय पर ज्यादा चर्चा करने लगे हैं. हमारे देश का मौसम विभाग(IMD) हर साल मानसून आने के पूर्व माह अप्रिल में अपना प्रारम्भिक और माह जून में पुनरीक्षित(Revised) पूर्वानुमान प्रतिवेदन प्रकाशित करता है. इस वर्ष प्रारम्भिक और पुनरीक्षित दोनों प्रतिवेदनों में सामान्य से अधिक मानसून आने का आंकलन किया गया था. इसका सामान्य अर्थ तो यही हुआ कि प्रायः बाढ़ ग्रसित इलाकों में ज्यादा वर्षा होगी और यही हुआ भी. पारिणामतः बाढ़ की विभीषिका गोरखपुर से लेकर किशनगंज तक और पश्चिम बंगाल तथा आसाम के इलाके बाढ़ से घिर गये हैं. बाढ़ पीड़ित लोग आपदा प्रबन्धन करने वालों के तरफ कातर दृष्टि से देख रहे हैं.      आपदा प्रबन्धन चार भागों में बंटा होता है.  (1) महत्वपूर्ण सूचना को साझा करना:- बाढ़ से सम्बन्धित सूचना तो हमारे मौसम विभाग ने काफी पहले ही दे दी थी और इसी अनुरूप NMDA, NDRF और राज्य के सम्बन्धित अधिकारी अपन...